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इतिहासअसहयोग आंदोलन (1920-22 ईस्वी) : कारण , परिणाम इत्यादि की व्याख्या |...

असहयोग आंदोलन (1920-22 ईस्वी) : कारण , परिणाम इत्यादि की व्याख्या | asahyog andolan in hindi

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया इसके बाद सितम्बर 1920 में असहयोग आंदोलन पर विचार करने के लिए कलकत्ता कांग्रेस महासमिति का अधिवेशन आयोजिय हुआ इस अधिवेशन में गाँधी जी ने असहयोग प्रस्ताव पेश किया और कहा

अंग्रेजी सरकार शैतान है जिसके साथ सहयोग सम्भव नहीं, अंग्रेज सरकार को अपनी भूलो पर कोई दुःख नहीं है। अतः हम कैसे स्वीकार कर सकते है की नवीन व्यवस्थापिकाएँ हमारे स्वराज का मार्ग प्रसस्थ करेगी। स्वराज की प्राप्ति के लिए हमारे द्वारा ‘प्रगतिशील , अहिंसकात्मक असहयोग की नीति अपनाई जानी चाहिए |

गाँधी जी के इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए एनी वेसेन्ट ने कहा – यह प्रस्ताव भारतीय स्वतंत्रता को सबसे बड़ा धक्का है। एक मूर्खतापूर्ण विरोध तथा समाज और सस्थ जीवन के विरुद्ध संघर्ष की घोषणा है।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, मदन मोहन मालवीय, देश बन्धु चितरंजनदास, विपिन चन्द्र पाल, मुहम्मद अली जिन्‍ना, शंकरन नायर तथा सर नारायण चन्द्रावरकर ने प्रारम्भ में इस प्रस्ताव का विरोध किया. फिर भी अली बंधुओं तथा मोती लाल नेहरू के समर्थन से भ्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। यही वह क्षण था, जहाँ से गाँधी युग की शुरुआत हुई |

असहयोग आंदोलन प्रस्ताव सम्बन्धी प्रमुख बातें

  • सरकारी उपाधि एवं अवैतनिक सरकारी पर्दों को छोड़ दिया जाए।
  • सरकार द्वारा आयोजित सरकारी तथा अर्द्धसरकारी उत्सवों का बहिष्कार किया जाय। स्थानीय संस्थाओं की सरकारी सदस्यता से इस्तीफा दिया जाय।
  • सरकारी स्कूलों एवं कालेजों का बहिष्कार किया जाय, वकीलों द्वारा न्यायालयों का बहिष्कार किया जाय। आपसी विवाद पंचायती आदालतों द्वारा निपटाया जाय।
  • असैनिक, श्रमिक व कर्मचारी वर्ग मेसोपोटामिया में जाकर नौकरी करे से इन्कार करें ।
  • विदेशी समानों का पूर्णतः बहिष्कार किया जाय।

दिसम्बर, 1920 ई० में नागपुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव से सम्बन्धित लाला लाजपत राय एवं चितरंजन दास ने अपना विरोध वापस ले लिया। गाँधी जी ने नागपुर में कांग्रेस के पुराने लक्ष्य अंग्रेजी साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन के स्थान पर स्वराज का नया लक्ष्य घोषित किया। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आवश्यक हुआ तो स्वराज के लक्ष्य को अंग्रेजी साम्राज्य के बाहर भी प्राप्त किया जा सकता है। ऐनी बेसेन्ट, मुहम्मद अली जिन्ना, विपिन चन्द्र पाल, जी० एस० खापर्डे जैसे नेताओं ने गाँधीजी के श्रस्ताव से असंतुष्ट होकर कांग्रेस को त्याग दिया। नागपुर अधिवेशन का ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इसलिए महत्व है क्योंकि यहां पर वैधानिक साधनों के अन्तर्गत स्वराज प्राप्ति के लक्ष्य को त्यागकर सरकार का सक्रिय विरोध करने की बात स्वीकार की गई।

असहयोग आन्दोलन की सफलता के लिए गाँधी जी ने कुछ रचनात्मक कार्यों को अपनाया, जिसमें मद्य बहिप्कार, छुआछूत से परहेज, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, हाथ से बुने खादी कपड़ों का प्रयोग, हिन्दू-मुस्लिम एकता, अहिंसा पर बल, कर न देना, कड़े कानूनों की अवज्ञा करना, कांग्रेस के झण्डे के नीचे समस्त राष्ट्र को एकत्र करना आदि शामिल थे।

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असहयोग आंदोलन की प्रकृति

असहयोग आन्दोलन शुरू करने से पहले गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रथम विश्व युद्ध में सहयोग के बदले में अंग्रेजों द्वारा दी गई “कैसर-ए-हिन्द‘ को उपाधि वापस कर दी। बहुत से अन्य लोगों ने भी गाँधी जी का अनुकरण करते हुए अपनी पद्वियों एवं उपाधियों को त्याग दिया। जमना लाल बजाज ने अपनी “राय बहादुर की उपाधि वापस कर दी। बहुत से वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी। इसमें बंगाल के देशबन्धु चितरंजन दास, उत्तर प्रदेश के मोतीलाल नेहरू एवं जवाहर लाल नेहरू, गुजरात के विट्वल भाई पटेल एवं बल्‍लभ भाई पटेल, बिहार के राजेन्द्र प्रसाद, मद्रास के चक्रवर्ती राजगोपालाचारी एवं दिल्‍ली की अरुणा आसफ अली सम्मिलित थीं। विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए अनेक शिक्षण-संस्थाएं जेसे काशी-विद्यापीठ एवं अलीगढ़ मुस्लिम-विश्वविद्यालय आदि की स्थापना हुई।

गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन 1 अगस्त, 1920 ई० को आरम्भ किया। इस आन्दोलन में कई मुस्लिम-नेताओं ने भी उनका साथ दिया जिनमें अबुल कलाम आजाद, मोहम्मद अली, शौकत अली, डॉ. अन्सारी आदि सम्मिलित थे। असहयोग आंदोलन चलाने के लिए 1921 ई० में “तिलक स्वराज फण्ड” की स्थापना की गई। छः: महीने के अन्दर हो इसमें 1 करोड़ रुपये एकत्रित हो गए।

1919 ई० के सुधार अधिनियम के उद्घाटन के लिए ‘ड्यूक ऑफ कामन्स‘ के भारत आने पर विरोध एवं बहिष्कार किया गया। 4 मार्च, 1921 ई०, को ननकाना के गुरुद्वारे में जहाँ पर शान्तिपूर्ण ढंग से सभा का संचालन किया जा रहा था, सैनिकों द्वारा गोली चलाने के कारण करीब 70 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। 1921 ई० में -लार्ड रीडिंग को भारत का वायसराय बनाए जाने पर दमन चक्र और बढ़ गया। अनेक प्रमुख नेता जेसे मोतीलाल नेहरू, मुहम्मद अली, चितरंजन दास, लाला लाजपत राय, मोलाना अबुल कलाम आजाद, राजगोपालाचारी, राजेन्द्र प्रसाद, सरदार बललभ भाई पटेल आदि नेता गिरफ्तार कर लिए गए। असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होने वाले पहले प्रमुख नेता महम्मद अली थे

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नवम्बर, 1921 ई० में प्रिंस ऑफ वेल्स’ के भारत आगमन पर उनका स्वागत काले झण्डे दिखाकर किया गया। गॉधीजी ने अली बन्धुओं की रिहाई न किए जाने के कारण प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन का बहिष्कार किया। इससे क्रुद्ध होकर सरकार ने कठोर दमन की नीति का सहारा लिया, परिणामस्वरूप स्थान-स्थान पर लाठी चार्ज, मार-पीट, गोलीकांड सामान्य बात हो गई ओर करीब 60,000 लोगों को इस अवधि में बन्दी बनाया गया। आन्दोलन भी अब जनता में गहरी जड़ें जमा चुका था। संयुक्त प्रान्त तथा बंगाल के हजारों किसानों ने असहयोग के आह्वान का पालन किया। पंजाब के गुरुद्वारों पर भ्रष्ट महन्तों का कब्जा समाप्त करने के लिए सिख्ख “अकाली आन्दोलन” नामक एक अहिंसक आन्दोलन चला रहे थे। असम के चाय बागानों के मजदूरों ने हड़ताल की। मिदनापुर के किसानों ने यूनियन बोर्ड को कर देने से इन्कार कर दिया उत्तरी केरल के मालाबार क्षेत्र में मोपला कहे जाने वाले मुस्लिम किसानों ने एंक शक्तिशाली जमींदार विरोधी आन्दोलन शुरू कर रखा था। गाँधीजी ने इस आन्दोलन को भी अपना समर्थन दिया। 1 -फरवरी, 1922 ई० को गाँधीजी ने घोषणा की कि अगर 7 दिनों के अन्दर राजनीतिक बन्दी रिहा नहीं किए जाते ओर प्रेस पर सरकार का नियंत्रण समाप्त नहीं होता, तो वे करों की अदायगी समेत सामूहिक रूप से बारदोली में एक सविनय अवज्ञा आन्दोलन छेड़ देंगे, परन्तु इसी समय चोरी-चोरा काण्ड हो गया जिसके कारण माँधीजी को असहयोग आंदोलन वापस ले लेना पड़ा।

असहयोग आंदोलन से संबंधित प्रश्न

असहयोग आंदोलन कब और क्यों हुआ?

असहयोग आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा सितम्बर 1920 में शुरू किया गया था जिसका उदेश्य प्रगतिशील , अहिंसकात्मक असहयोग की नीति अपनाकर स्वराज की प्राप्ति करना था।

असहयोग आंदोलन का मुख्य कारण क्या है?

गाँधी जी असहयोग आंदोलन शुरू करने का मुख्य कारण यह था की उनका मानना था की यदि भारतीयों ने अग्रेजों का सहयोग करना बंद कर दिया तो ब्रिटिश साम्राज्य का पतन हो जाएगा और हमें स्वराज की प्राप्ति होगी।

असहयोग आंदोलन की शुरुआत कब हुई थी?

असहयोग आंदोलन की शुरुआत सितंबर 1920 में की गयी जब कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में इसे पारित किया गया था।

असहयोग आंदोलन कब समाप्त हुआ था?

1922 में हुए चोरी-चौरा कांड के बाद गाँधी जी असहयोग आंदोलन के समाप्ति की घोषणा कर दी।

असहयोग आंदोलन किसने समाप्त किया?

गांधी जी ने चोरी-चौरा कांड के बाद

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