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मध्यप्रदेशMPPSC 2022 : मध्य प्रदेश की जनजातियां , उनकी उपजातियाँ ,नृत्य ,त्यौहार...

MPPSC 2022 : मध्य प्रदेश की जनजातियां , उनकी उपजातियाँ ,नृत्य ,त्यौहार ,निवास स्थान ( madhya pradesh ki janjatiya)

मध्य प्रदेश भारत का सबसे अधिक जनजातिये जनसंख्या वाला राज्य है। मध्य प्रदेश में लगभग 1 करोड़ 53 लाख जनजातियां निवास करती है। जो प्रदेश की कुल जनसँख्या का 21.1% है मध्य प्रदेश की जनजातियां (madhya pradesh ki janjatiya) में सबसे अधिक गोंड , भील ,सहरिया ,कोल, कोरकू , वैगा आदि जनजातियां पाई जाती है मध्य प्रदेश में कुल 46 प्रकार की जनजातियां पाई जाती है मध्य प्रदेश में सर्वाधिक जनजाति जनसंख्या धार में और न्यूनतम जनजाति जनसंख्या भिंड जिले में पाई जाती है

जनजाति क्या होती है।

समाज के ऐसे लोग जो समाज की मुख्य धारा से अलग होते है इनका अपना अलग रहन -सहन ,पहनावा ,संस्कृति ,वेशभूसा , खान-पान , नृत्य ,त्योहार , विवाह , देवी -देवता होते है जनजाति की कहलाती है।

प्रसिध्द अथशास्त्री कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में जनजातियों को वन्यजीव कहकर पुकारा था। जबकि अशोक ने इनके लिए महामात्य नामक विभाग की स्थापना की 1932 में महात्मा गाँधी जी ने जनजातियों के उत्थान के लिए हरिजन सेवक संघ की स्थापना की। एवं इन्हे हरिजन कहकर पुकारा। गाँधी जी ने जनजातियों के लिए कांग्रेस के अंदर निर्वाचन क्षेत्र देने की बात कहि

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 366(25) में जनजातियों की परिभाषा दी गई है। और अनुच्छेद 338 (A) में अनुसूचित जनजाति आयोग के गठन की बात की गई है। अनुच्छेद 342 (1) के अनुसार राष्ट्रपति किसी समुदाय को जनजाति घोषित कर सकता है। लेकिन संविधानिक प्रावधानों के अनुसार।

मध्य प्रदेश में 46 प्रकार की जनजातियां पाई जाती है जिनमे सबसे बड़ी जनजाति भील है। 1965 में मध्य प्रदेश में हरिजन कल्याण विभाग की स्थापना की गई थी।

भील जनजाति

भील शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के भिल्ल या विल्ल शब्द से हुई है जिसका अर्थ है। धनुष बाण या तीर कमान से है। रामायण की पात्रा सबरी भील जनजाति से सम्वन्धित थी। भील जनजाति प्रोटोएस्ट्रेलियायी के अंतर्गत आती है। जबकि भाषा के आधार पर द्रविड़ियन शैली के है।

निवास स्थान झाबुआ ,अलीराजपुर ,बड़बानी ,धार ,खंडवा ,खरगोन आदि
उपजाति भिलाला ,बरेला ,पटलिया ,वैगास ,रथिहास ,राठयास
नृत्य भगोरिया ,गोलगधेड़ो , घूमर
विवाह भगोरिया विवाह , अपहरण विवाह , चर ,चौर ,राजीगाजी ,लामझना , लमझेना , घरजमाई
त्यौहार भगोरिया ,बीदरीपूजा ,वकपंथी ,नवाखानी ,छेरता ,जातरा , नवई , चलावड़ी
शारीरिक बनावट त्वचा गहरी काली ,कद माध्यम, बाल घुंघराले ,हॉट मोटे ,माथा चपटा ,आँखे उभरी हुई , और स्त्रियां सामन्यता मोती होती है।
देवता राजपंथा देव , महादेव , वरमदेव , दूल्हादेव , ठाकुरदेव ,भैसादेव , धनुदेव ,
देवी चामुंडा ,काली देवी , खैर देवी , ठकुराइन देवी
कृषि छेरता कृषि
खान -पान वासी ,पेंज ,वियारी
तड़वी भील ओरंगजेब शासन काल भील जनजाति के जिन लोगो ने इस्लाम स्वीकार किया वे तड़वी भील कहलाये।

गोंड जनजाति

यह मध्य प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है। गोंड शब्द की उत्पत्ति तेलगु भाषा के कोण से हुई है। जिसका अर्थ है। पर्वतो में रहने वाली जनजाति।

निवास स्थान – गोड़ जनजाति के लोग नर्मदा घाटी के दोनों ओर सतपुड़ा व विध्यांचल पर्वतो के कगारों पर निवास करते है। ये सामन्यता प्रदेश के सभी जिलों में पाए जाते है।

उपजाति – अगरिया ,ओझा , कोयलाबुतुस , प्रधान ,नगारची , सोलाहास

नृत्य – कर्मा , सैला , सजनी , दीवानी , भरोनी ,कहरनि , गोचो ,गेड़ी

विवाह दूध लोटावा – यह गौड़ जनजाति का प्रमुख विवाह है। इस विवाह अंतर्गत दूध के रिश्ते को छोड़कर अन्य सभी रिस्तो में विवाह कार्य सपन्न होता है।

शारीरिक वनावट – इनकी त्वचा काली , कद छोटा , वाल काले ,नाक चपटी और होठ मोटे होते है। स्त्रियों का कद और छोटा होता है स्त्रियाँ मेहनती होती है।

वेस भूसा – स्त्रियां कमर के नीचे साड़ी और पुरुष धोती , मण्डी ,और मुरेठा पहनते है।

गोड़ों के दो प्रमुख वर्ग है। – राज गोड़ और धुर गोड़

गोड़ो की आजीविका – ये लोग मुख्यता कृषि पर निर्भर रहते है। और कृषि ही इनकी आजीविका का साधन है। और यह हल की पूजा करते है।

देवता – बड़ा देव , ठाकुर देव , नारायण देव , नागेश्वर देव , दूल्हा देव , लिंगो देव

देवी – खैर माई , खड़िया माई , शारदा माई , बूढ़ी माई

मृत्यु गान – गोड़ जनजाति के लोग मृत्यु के समय जो गान गाते है उन्हें राहुल पाटा कहा जाता है।

बैगा जनजाति

यह यह मध्य प्रदेश की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति है जो अति पिछड़ी जनजाति है। यह प्रोटो ऑस्टेलियाई प्रजाति की जनजाति है।

निवास क्षेत्र – यह जनजाति मुख्यता दक्षिण प-पूर्वी मध्य प्रदेश में निवास करती है। विशेषकर शहडोल , उमरिया ,अनूपपुर , मंडला , बालाघाट , डिंडोरी अर्थात बेगांचल बाले एरिया में मुख्यता यह जनजाति डिंडोरी में पाई जाती है।

उपजाति – नरौतिया , भरोटिया , रायमेना , नाहर , विछवार ,कायमेना

नृत्य – रीना ,परधौनी , कर्मा , सैला

देवता – वूडादेव , राजपंथा देव , महादेव

विवाह – चर , चोर , लमझेना , लामझना

आजीविका – बैगा जनजाति के लोग कृषि पर निर्भर है। ये लोग स्थान स्थान्तरित कृषि करते है। जिसे वेवास या पेडू कहा जाता है।

पंचायत का मुखिया – मुकद्दम , कोहिया , कोटवार ,समाथ

देवियाँ – खैरदेवी , ठकुराइन देवी , बूढ़ी माई

त्यौहार – नवाखानी , छेरता ,जातरा ,नवई , चलावडी

सहरिया जनजाति

यह मध्य प्रदेश की अति पिछड़ी जनजाति है। ये कोलेरियन परिवार की जनजाति है। जो प्रॉटो ऑस्ट्रेलियाड परिवार से है। सहरिया शब्द की उतपत्ति सहराना शब्द से हुई है। जिसका अर्थ है शहर में रहने वाली जनजाति।

निवास क्षेत्र – सहरिया जनजाति मुख्यता प्रदेश के उत्तर में अर्थात मध्य भारत के पठार विशेषकर भिंड ,मुरैना ,ग्वालियर

नृत्य – दुल -दुल घोड़ी ,रागनी , लहगी

आजीविका का साधन – सहरिया जनजाति के लोग शहर में रहते है। और यह लोग जंगलो से शहद लाकर इसे शहर में बेचते है। जो इनकी जीविका का मुख्य साधन है। प्रदेश में सर्वाधिक शहद मुरैना में पाई जाती है।

शारीरिक बनावट – इस जनजाति के लोग मदिरा का अत्यधिक सेवन करते है। जिस कारण ये शरीर से अत्यधिक कमजोर होते है। यह जनजाति अत्यधिक छह रोग से पीड़ित है।

मुखिया – पटेल , और पंचायत के मुखिया को – कोटबार ,बराई ,भोपा

वेस -भूसा – पुरुष धोती मंडी व साफा पहनते है। और स्त्रियां लहंगा , घागरा ,लुगंता , मलुका पहनती है।

विवाह – चर ,चोर , लमजना , लमसेना

देवता – ठाकुर देव , नारायण देव , दूल्हा देव

कोरकू जनजाति

कोरकू का शाब्दिक अर्थ है। मनुष्यो का समूह यह लोग मुंडा या कोलेरियन परिवार से है।

निवास स्थान – कोरकू जनजाति के लोग दक्षिणांचल में विशेषकर बेतूल , हरदा , होशंगाबाद ,खंडवा ,खरगोन , बुरहानपुर आदि में निवास करते है।

उपजाति – पठारिया , रूमा , दुलारिया , बोबई ,

नृत्य – खम स्वांग , चटकोला ,थपती

विवाह – लमझना ,हट विवाह , विधवा विवाह , लमसेना विवाह

भेस -भूसा – पुरुष- धोती मंडी अंगोछा और महिलाये -लुंगडाचोली

गांव का मुखिया – पटियाल ,भूमिका

आजीविका – इस जनजाति लोग मुख्यता कृषि करते है यही इनके जीवन जीने का आधार है। इसके अलावा पशु पालन ,मतस्य पालन ,तथा वन उपार्जन संग्रह भी भी करते है।

देवता – इस जनजाति के गांव के देवता को डोगर देव कहते है ये लोग शिव के उपासक होते है महादेव की पूजा करते है।

भोजन – इनके भोजन को लक्षणा कहा जाता है।

सिडोंली – इस जनजाति के लोग मृतकों को जलाने की बजाय दफनाते है इसे सिडोंली कहा जाता है

कोरकू जनजाति 2 की होती है 1 राजकोरकू 2 पोथारिया कोरकू

कोल जनजाति

कोल जनजाति कोलेरियन या मुंडा प्रजाति की जनजाति है इनकी उत्पत्ति सबरी से मानी जाती है।

निवास क्षेत्र – रीवा , सतना , सीधी , सिगरौली , कटनी , अनूपपुर , जबलपुर , शहडोल , आदि अर्थात यह लोग प्रदेश के उत्तर पूर्व में निवास करते है।

उपजातियां – रौतिया , रौतेल

विवाह – मगनी , राजीगाजी , विधवा

नृत्य – कोल दहका , करमा ,सैला ,

देवता – वरमदेव , सन्याशी देव , भैरो देव

देवी – ठकुराइन देवी

मुखिया – इनके मुखिया को चौधरी एवं पंचायत को गोहिया कहते है।

भेस -भूसा – पुरुष -कमीज , धोती ,मुरेठा महिलाएं धोती ,मंडी

आजीविका – कृषि प्रधान

निवास स्थान – इनके निवास स्थान को टोला कहा जाता है।

भारिया जनजाति

यह मध्य प्रदेश की अति पिछ्ड़ी जनजातियो में से एक है। यह जनजाति छिंदवाड़ा जिले के पाताल कोट में निवास करती है। इनके निवास स्थान को ठाना कहते है

विवाह – लमसेना ,रजिगाजी , विधवा , मगनी ,

नृत्य – सैतान ,कर्मा ,सैला

त्यौहार – विदरीपूजा , नवपंथी , जवारा

देवता – नागेस्वर देव , दूल्हा देव , वोगेस्वर देव , बड़ा देव , बूढ़ा देव

आजीविका – कृषि प्रधान है। इस जनजाति के लोग पत्थरो के बीच में कृषि करते है जिसे ढईया कृषि कहते है।

भेस -भूसा – ये लोग सिर पर पगड़ी बांधते जिसे पगईया कहा जाता है।

मुखिया – पटेल

भोजन – वासी , पेच , वियारी

अगरिया जनजाति

यह गोड़ जनजाति की उपजाति है। यह प्रदेश के मंडला ,डिंडोरी , सीहोर ,अनूपपुर , जबलपुर , आदि जिलों में निवास करती है। इनके प्रमुख देवता लोहासुर है। इस जनजाति के द्वारा लोहे का कार्य किया जाता है।

बंजारा जनजाति

बंजारा मूलतः राजस्थान के है ये घुमक्क्ड प्रकार की जनजाति है। इस जनजाति के द्वारा कंघे का अविष्कार किया गया। यह जनजाति सिख धर्म से प्रभावित है। गुरु नानक देव को अपना भगवान मानती है। गुरुग्रंथ साहिब में अटूट विश्वास रखती है। ये जनजाति सर्वाधिक श्रृंगार पूर्ण जनजाति है।

पनिका जनजाति

यह जनजाति सीधी , शहडोल , अनूपपुर , उमरिया में पाई जाती है। यह कबीर दास जी से प्रभाबित है। इस जनजाति के लोग कपड़े वुनने का काम करते है। अर्थात जुलाहे होते है।

सौर जनजाति

यह जनजाति सागर , दमोह आदि जिलों में निवास करती है।

धनुका जनजाति

भिंड मुरैना

हलवा

बालाघाट

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