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स्वदेशी आंदोलन |स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव, महत्व ,असफलता के कारण swadeshi andolan in hindi

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन मे स्वदेशी आंदोलन को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है जा भारतीयों के एक सफल रणनीति वे का परिचायक माना जाता है। स्वदेशी का अर्थ है अपने देश का। इस आंदोलन का मुख्य लक्ष्य ब्रिटेन में बनी वस्तुओं का बहिष्कार करना था। तथा भारत में बनी वस्तुओं का अधिकाधिक प्रयोग कई ब्रिटेन को आर्थिक क्षति पहुँचाना था। इस रणनीति से न केवल औपनिवेशिक शासन को आर्थिक रूप से नुकसान पहुँचा बल्कि इसमे देश में नए रोजगार का भी सृजन हुआ। इसलिये इस आंदोलन को एक रणनीति के तहत अपनाया गया था।

स्वदेशी अपनाना एवं विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का यह आंदोलन संपूर्ण भारतवर्ष में फैल गया। पंजाब में इस आंदोलन का नेतत्व अजीत सिंह , लाला लाजपत राय, महाराष्ट्‌ में बाल गंगाधर तिलक दिल्ली में सैयद हेंदर रज़ा, मद्रास में चिदंबरम्‌ पिल्ले तथा संपूर्ण मध्य भारत, उत्तर भारत, बंगाल-बिहार में रवींद्रनाथ टैगोर, सुरेंद्र नाथ बनर्जी, अरविंद घोष आदि नेताओं ने किया।

स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव

इस आंदोलन को सर्वाधिक सफलता विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से मिली। महिलाओं ने विदेशी प्रसाधन-सामग्री, चूड़ियों एवं बर्तनों आदि का प्रयोग बंद कर दिया। धोबियों ने विदेशी कपड़ों को धोने. इनकार कर दिया। अनेक जगह बिदेशी कपड़ों की होलिका जलाई गई। मंदिरों के प्रसाद में यदि विदेशी चीनी का प्रयोग किया जाता है। तो महंत उस प्रसाद को लेने से इनकार कर देते। स्वदेशी आंदोलन ने लोगों को आत्मशक्ति और आत्मनिर्भर का नारा दिया। स्वदेशी वस्तुओं की आपूर्ति को सुनिश्चित करने हेतु स्वदेशी प्रतिष्ठानों की स्थापना की गई। आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने प्रसिद्ध बंगाल केमिकल्स फैक्टरी की स्थापना को।

स्वदेशी आंदोलन का सर्वाधिक प्रभाव कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में पड़ा। इस काल के महान राष्ट्रवादियों, जैसे-रवींद्रनाथ टैगोर, रजनीकांत सेन, द्विजेंद्रलाल राय, मुकुंद दास, सैयद अबु मोहम्मद इत्यादि ने अपनी कविताओं एवं गीतों के माध्यम से आंदोलनकारियों को प्रेरणा दी। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसी समय आमार-सोनार बांग्ला नामक गीत की रचना की जो कालांतर में बांग्लादंश का राष्ट्रीय गीत बना। बंगाल की गलियाँ और सड़कें देशभक्ति के गीतों से गूँज उठीं।

चित्रकला के क्षेत्र में रविंद्रनाथ टैगोर का इस आंदोलन के प्रति योगदान अविस्मरणीय रहा। अजंता एवं राजपूत काल की चित्रकला से प्रेरणा लेकर अनेक राष्ट्रवादी चित्रों का निर्माण किया गया। प्रसिद्ध भारतीय कला मर्मज्ञ नंदलाल बोस ने भारतीय कला के प्रोत्साहन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

शिक्षा के क्षेत्र में भी इस काल में स्वदेशी आंदोलन का विकास देखा जा सकता है। रविंद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन से प्रेरणा लेकर कलकत्ता में बंगाल नेशनल कॉलेज स्थापित किया गया तथा अरविंद घोष इसके प्रथम प्रधानाचार्य नियुक्त किये गए। शीघ्र ही देश के अन्य भागों में नेशनल स्कूल एवं कॉलेज स्थापित किये गए। अगस्त 1906 में नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकशन की शुरुआत की गई।

स्वदेशी आंदोलन का महत्त्व

यद्यपि स्वदेशी आंदोलन असफल रहा परंतु इसमें अनेक प्रवृत्तियाँ और शक्तियाँ विद्यमान थीं जिनसे भारतीय जनमानस प्रभावित हुआ। इसने जहाँ एक ओर राष्ट्रवाद को व्यावहारिक राजनीति के धरातल पर ला खड़ा किया वहीं दूसरी ओर परवर्ती स्वतंत्रता आंदोलन की नींव रख दी। इस आंदोलन ने सिद्धांतों, विचारधाराओं एवं भावनाओं की सीमाओं से ऊपर उठकर भारतीयों में एकता एवं अखंडता जेसे मूल्यों को प्रतिष्ठित किया। ब्रिटिश सरकार ने जब आंदोलन का दमन करना चाहा तो उग्र राष्ट्रीयता की भावना का उदय हुआ। |

इस आंदोलन का महत्त्व इस लेकर भी है कि इसने लोगों को स्वदेशी के लिये प्रेरित किया, भारतीय उद्योगों का प्रोत्साहन मिला तथा विदेशी वस्तुओं के आयात में कमी आई। इस आंदोलन से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र उद्योग, शिक्षा, संस्कृति ओर साहित्य में स्वदेशी की भावना का प्रसार हुआ। इस आंदोलन का ही महत्त्व है कि ब्रिटिश सरकार को भी यह मसहूस हो गया कि निंम्वर्गीय भारतीयों में भी औपनिवेशिक शोषण कौ समझ उत्पन हो गई है।

इन्हे भी देखे – कैबिनेट मिशन योजना क्या है। ( cabinet mission plan in Hindi 1946 )

स्वदेशी आदोलन की असफलता के कारण

स्वदेशी आंदोलन एक सक्रिय संघठन या पार्टी का रूप नहीं ले सका। यधपि इस आंदोलन से विभिन्न गाँधीवादी सिद्धांतों यथा सत्याग्रह, जेल भरो आदोलन को एक गति मिली लेकिन इन सबको एक अनुशासनात्मक दिशा नहीं मिल सकी।

ब्रिटिश सरकार ने आदोलन को कुचलने के लिये आंदोलनकारियों के प्रति कठोर दमनात्मक रुख अपनाया

आंदोलन आगे चलकर नेतृत्वविहीन हो गया क्‍योंकि वर्ष 1908 तक अधिकांश नेता या तो गिरफ्तार कर लिये गए थे या देश से निर्वासित कर दिये गए थे। इसी समय अरविंद घोष तथा विपिनचंद्र पाल ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया।

कांग्रेस के नेताओ के मध्य आंतरिक मतभेद के कारण वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन हो गया। इससे आंदोलन को भारी नुकसान पहुँचा

आंदोलन ने जनसामान्य की शक्ति और ऊर्जा को उभारने का कार्य तो किया किंतु इस शक्ति एवं ऊर्जा को संगठित कर वह सही स्वरूप एवं दिशा देने में सफल नहीं हो सका

स्वदेशी आदोंलन समाज के सभी वर्गों में अपना स्थान नहीं बना सका। यह उच्च वर्ग, मध्य वर्ग, ज़मींदारों तथा कुछ चुद्धिजोवी वर्ग तक ही सीमित रहा। मुसलमानों तथा किसानों को प्रभावित करने में यह पूर्णतया असफल सिद्ध हुआ।

असहयोग एवं सत्याग्रह आंदोलन को मुख्यतः सिद्धांत रूप में ही स्वीकृत किया गया तथा यह ज़्यादा व्यावहारिक रूप नहीं ले सका।

आंदोलन क नेतृत्व वर्ग के पास प्रगतिशील योजना एवं कार्यनीति का अभाव था।

स्वदेशी आंदोलन का मुल्यांकल

  • यधपि स्वदेशी आंदोलन अपने उदेश्यों में सफल नहीं हो पाया किन्तु इस आंदोलन की उपलब्धियों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। यह आंदोलन आधुनिक भारत के इतिहास की एक प्रमुख घटना थी तथा इसके अत्यंत दूरगामी परिणाम सिद्ध हुए
  • देश प्रेम एवं राष्ट्रीयता का तीव्र प्रसार करने में स्वदेशी आंदोलन को आपार सफलता मिली। यह आंदोलन विदेशी शासन के विरुद्ध जनता की भावनाओ को जाग्रत करने का अत्यंत शक्तिशाली साधन सिद्ध हुआ
  • अभी तक स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीती से पृथक रहने वाले अनेक वर्गों यथा – छात्रों, महिलाओं , तथा कुछ ग्रामीण एवं शहरी जनसख्यां ने इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।
  • स्वतंत्रता आंदोलन के सभी प्रमुख माध्यमों जैसे – उदारवाद से राजनितिक, अतिवाद , क्रांतिकारी आतंकबाद से प्रारंभिक समाजबाद तथा याचिका एवं प्राथना – पत्रों से असहयोग एवं सत्याग्रह का अस्तित्व इस आंदोलन में परिलक्षित होते है।
  • आंदोलन का प्रभाव क्षेत्र राजनीतिक जगत तक ही सीमित न रहा अपितु साहित्य , विज्ञान , एवं उधोग जगत पर भी इसका प्रभाव पड़ा।
  • आंदोलन से लोगों की निंद्रा टूटी तथा वे साहसिक राजनीतिक भागीदारी एवं राजनीतिक कार्यों में एकता की महत्तता से परिचित हुए।
  • स्वदेशी आंदोलन ने उपनिवेशवादी विचारो एवं संस्थानों की वास्तविक मंशा को लोगो से समक्ष अनावृत कर दिया।
  • आंदोलन से प्राप्त हुए अनुभव से स्वतंत्रता संघर्ष की भावी राजनीती को तय करने में सहायता मिली।

इस प्रकार स्वदेशी आंदोलन ने उदारवादियों की याचिका अवं अनुनय-विनय की नीति को अप्रसांगिक अवं व्यथ साबित कर दिया। उदारवादी अपने कार्यक्रम अवं नीतियों को यथोचित गति नहीं प्रदान कर सके उनकी यह असफलता इस बात से सिद्ध हो गई की युवा पीढ़ी ने अनेक नेतत्व को नकार दिया तथा उन्हें सहयोग सेने से इंकार कर दिया जनसहयोग प्राप्त करने में नरमपंथीयों की असफलता से यह बात स्पष्ट हो गई की उनकी नीतियां भारतियों में जड़े नहीं जमा सकी। नरमपंथी अपने उदेश्यों एवं लक्ष्यों का व्यापक प्रचार -प्रसार भी नहीं कर सके स्वदेशी अवंवहिष्कार आंदोलन के प्रारंभिक चरण में उदारबादी इसे अखिल भारतीय स्वरुप प्रदान करने में असफल रहे तथा उनके नेतत्व में आंदोलन में कोई खास प्रगति नहीं हुई

FAQ –

स्वदेशी आंदोलन कब और किसने चलाया?

स्वदेशी अपनाना एवं विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का यह आंदोलन संपूर्ण भारतवर्ष में फैल गया। पंजाब में इस आंदोलन का नेतत्व अजीत सिंह , लाला लाजपत राय, महाराष्ट्‌ में बाल गंगाधर तिलक दिल्ली में सैयद हेंदर रज़ा, मद्रास में चिदंबरम्‌ पिल्ले तथा संपूर्ण मध्य भारत, उत्तर भारत, बंगाल-बिहार में रवींद्रनाथ टैगोर, सुरेंद्र नाथ बनर्जी, अरविंद घोष आदि नेताओं ने किया।

भारत में स्वदेशी आंदोलन कब हुआ था?

1905 में

स्वदेशी आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?

स्वदेशी अपनाना एवं विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार

स्वदेशी आंदोलन के कारण क्या थे।

स्वदेशी आंदोलन एक सक्रिय संघठन या पार्टी का रूप नहीं ले सका। यधपि इस आंदोलन से विभिन्न गाँधीवादी सिद्धांतों यथा सत्याग्रह, जेल भरो आदोलन को एक गति मिली लेकिन इन सबको एक अनुशासनात्मक दिशा नहीं मिल सकी।
ब्रिटिश सरकार ने आदोलन को कुचलने के लिये आंदोलनकारियों के प्रति कठोर दमनात्मक रुख अपनाया
आंदोलन आगे चलकर नेतृत्वविहीन हो गया क्‍योंकि वर्ष 1908 तक अधिकांश नेता या तो गिरफ्तार कर लिये गए थे या देश से निर्वासित कर दिये गए थे। इसी समय अरविंद घोष तथा विपिनचंद्र पाल ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया।
कांग्रेस कांग्रेस के नेताओ के मध्य आंतरिक मतभेद के कारण वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन हो गया। इससे आंदोलन को भारी नुकसान पहुँचा
आंदोलन ने जनसामान्य की शक्ति और ऊर्जा को उभारने का कार्य तो किया किंतु इस शक्ति एवं ऊर्जा को संगठित कर वह सही स्वरूप एवं दिशा देने में सफल नहीं हो सका….. और अधिक आर्टिकल में देखे

स्वदेशी आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?

। पंजाब में इस आंदोलन का नेतत्व अजीत सिंह , लाला लाजपत राय, महाराष्ट्‌ में बाल गंगाधर तिलक दिल्ली में सैयद हेंदर रज़ा, मद्रास में चिदंबरम्‌ पिल्ले तथा संपूर्ण मध्य भारत, उत्तर भारत, बंगाल-बिहार में रवींद्रनाथ टैगोर, सुरेंद्र नाथ बनर्जी, अरविंद घोष आदि नेताओं ने किया।

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